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Friday, July 2, 2010

लाहौर में फ़िदायीन हमले में 50 की मौत, सैंकड़ों ज़ख्मी


लाहौर। पाकिस्तान के लाहौर शहर में "हजरत दाता गंज बक्श" की दरगाह में गुरूवार देर रात हुए दो फ़िदायीन हमले में कम से कम 50 लोगों की मौत हो गई और 175 से अधिक घायल हो गए।
स्थानीय अखबार "द न्यूज" के अनुसार कुछ मिनटों के अंदर हुए दो विस्फोटों में सैक़डों लोग घायल हो गए। दोनों फ़िदायीन अपने शरीर से 20 किलोग्राम से अधिक विस्फोटक बांधे हुए थे। दोनों आतंकवादियों ने दरगाह परिसर में दो जगहों पर विस्फोट कर दिया। पहले आत्मघाती हमलावर ने अपने आप को दरगाह के बेसमेंट में रात लगभग 10.46 बजे अपने आप को उ़डा लिया। दूसरा विस्फोट दो मिनट बाद उस समय हुआ जब दूसरे हमलवार ने दरगाह के अहाते में दाखिल होने के बाद खुद को विस्फोट से उ़डा दिया। पुलिस के अनुसार हमलावरों की उम्र 20-22 के बीच थी। दरबार के वज़ू खाने के निकट एक बम बरामद किया गया। आत्मघाती हमले के बाद घटना स्थल पर लोगों के शव इधर-उधर बिखरे हुए थे। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया, "धमाके के बाद पुरूष, महिलाएं और बच्चे चारों तरफ भाग रहे थे। पूरा का पूरा बेसमेंट मलबे में तब्दील हो गया।" घटना के बाद सैक़डों लोग इधर-उधर भागकर अपने रिश्तेदारों की तलाश कर रहे थे। दरगाह के प्रमुख ने बताया हमले से संबंधित धमकियां मिल चुकी थी। सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम न होने की वजह से यह हादसा हुआ। बम निरोधक दस्ते के अधिकारियों ने शवों के नमूनों को फोरेंसिक जांच के लिए एकत्रित किया है। पुलिस ने इलाके को चारों तरफ से घेर लिया है। पुलिस ने बुरी तरह से क्षत विक्षत हमलावरों के शवों को बरामद कर लिया है।

Friday, June 18, 2010

न्यूज़लाईन विशेष: अजब गांव की गज़ब कहानी: आस्था या अंधविश्वास:




खालिद हसन -
कुशीनगर:इसे आस्था का जुनून कहें या फ़िर अंधा विश्वास ,जहां हर हाल में सदियों से चली आ रही अजीबो-ग़रीब परंपरा को निभाने का चलन है। परंपरा की बेड़ियों में जकड़े लोगों की ये दिलचस्प कहानी उत्तर प्रदेश के कुशीनगर ज़िले की है, जहां का मुंडेरा गांव आज के दिन पूरी तरह से ख़ाली हो जाता है, दिन निकलने से पहले इस गांव के सब लोग गांव की सीमा से बाहर चले जाते हैं और दिन ढ़लने के बाद ही गांव में वापिस आते हैं। इस दौरान घरों में ताले भी नहीं लगाये जाते। हर तीसरे साल जेठ महीने के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार या सोमवार को इस अजीब परंपरा को निभाया जाता है। दिन निकलते ही गांव की बाहरी सीमा पर ग्रामीणों का जमावड़ा लग जाता है और गांव में पूरी तरह सन्नाटा छा जाता है। काली मंदिर मे पूजा और सूर्यास्त के बाद गांव की परिक्रमा कर पताका फहरायी जाती है और इसके बाद ही लोगों की गांव में वापसी होती है। इस पूरे प्रायोजन को 'पराह' कहा जाता है।
गांव के बुज़ुर्गों के मुताबिक सदियों से चली आ रही इस परंपरा के निभाने से पूरा गांव गंभीर बीमारी और दैवीय आपदा से बचा रहता है। दर असल कई सौ साल पहले इस गांव में थारू जन जाति की बस्ती थी, जिन्हें सपने में मां काली ने गांव के बाहर पराह करने के आदेश दिये थे और ये भी कहा था कि ऐसा करने से पूरा गांव गंभीर बीमारी और दैवीय आपदा से बच जायेगा। थारू जन जाति के लोगों की इस परंपरा को मुंडेरा गांव के लोग आज भी ज़िंदा रखे हुए हैं। यही नहीं गांव मे कोई नव विवाहिता हो या प्रसूता स्त्री सभी को इस परंपरा का पालन करना पड़्ता है। और तो और गांव के बाहर काम करने वाले इस गांव के लोग छुट्टी लेकर इस परंपरा को निभाने आते हैं। इस गांव के लोगों की ये भी मान्यता है कि पराह के दिन यदि कोई गांव मे रुका और उसने पानी भी पिया तो वो अंधा हो जाता है इस डर से भी गांव में कोई भी नहीं रुकता। पराह के दिन घरों में ताले नहीं लगते और चोरी भी नहीं होती। इस मौके पर चंदे के पैसे से खरीदी गई एक भेड़ के गले मे कुछ खाद्य सामग्री बांध उसे काली मंदिर ले जाया जाता है जहां उसके गले से सामग्री खोल कर प्रसाद स्वरूप बांट दिया जाता है। एक दर्जन ब्राहमणॊं को इस मौके पर भोजन कराया जाता है। इस वैज्ञानिक युग में गांव वालों की नज़र मे पराह एक धार्मिक आयोजन है और इन लोगों का इस परंपरा में पूरा विश्वास है।

सामाजिक सरोकार: आंटी, हो सके तो माफ़ करियेगा:


साभार श्री राजू मिश्रा: संस्मरण-
लखनऊ: शुक्रवार, १५ जनवरी २०१०

रह-रहकर गूंजता कुत्‍तों का रूदन चर्च परिसर में रुकने से रोकता है। ये कुत्‍ते अपनी मां को खोकर अनाथ हो चुके हैं। उस मां को जिसने इन्‍हें जना तो नहीं था अलबत्‍ता पाला-पोसा अपनी औलाद की मानिन्‍द। जाड़ा पड़ा तो शीरीन ने अपने तन की फिक्र नहीं की, कुत्‍तों को बेहतरीन स्‍वेटर पहनाये। भोजन भी एक से बढ़कर एक। कभी गोश्‍त पका तो कभी दूध और ब्रेड से काम चला लिया। कड़ाके की ठंडक ने जब शीरीन महावीर को लीला तो संबंधी इतना नहीं रोये, जितना कि यह कुत्‍ते रोये। कुत्‍ते रोये ही नहीं बल्कि अभी भी चुप लगाने का नाम नहीं ले रहे। लखनऊ के इस्‍लामिया कालेज के बगल रेड चर्च परिसर में रहने वाली शीरीन महावीर को होश संभलते ही सड़क के आवारा कुत्‍तों से ऐसा लगाव हुआ कि पूरी जिन्‍दगानी होम कर डाली उन्‍होंने कुत्‍तों पर। शीरीन ने शादी नहीं की। क्‍यों नहीं की, इस सवाल पर शीरीन कहने लगती- क्‍या बताऊं साहब। अपने लिये तो सब जीते हैं। मैं तो कुछ भी नहीं करती इनके लिए। सब गाड ही करता-कराता है। मै तो सिर्फ ऊपर वाले की वाचमैन हूं। शीरीन को अपनापे में कुछ लोगों ने खिताब दे डाला-'कुत्‍ते वाली आन्‍टी' और आन्‍टी भी ऐसी कि कभी किसी की बात का बुरा नहीं माना। एक महाविद्यालय में अंग्रेजी की लेक्‍चरर रही शीरीन का बहन की लड़की सुखबीर को छोड़कर इस दुनिया में कोई सगा न था। नौकरी के दौरान शीरीन ने अपनी पूरी तनख्‍वाह कुत्‍तों पर उड़ा डाली और रिटायर हुई तो पेंशन भी कुत्‍तों पर न्‍यौछावर कर दी। अपने पहनने -खाने की कभी कोई परवाह नहीं की। कुत्‍तों के लिए जो बना उसी में से कुछ अपने लिये भी निकाल लिया। कोई कुत्‍ता बीमार होता तो शीरीन की पेशानी पर बल पड़ जाते। डाक्‍टरों के यहां दौड़ती-भागती और दवाइयों का इंतजाम करती। खुददारी इतनी कि कभी किसी के सामने हांथ पसारना गंवारा नहीं किया। कोई दशक भर पहले मेरा परिचय हुआ था शीरीन से। हजरतगंज में शान के साथ टहलती शीरीन और उनके पीछे अलमस्‍त आवारा कुत्‍तों की एक लम्‍बी फौज। हर शख्‍स कभी शीरीन को घूरता तो कभी उनके अमले को और शीरीन थी कि बस अपनी ही धुन में चलती चली जा रहीं थी। कुत्‍तों के प्रति हमदर्दी शीरीन में कूट-कूट कर भरी थी। अपनी इस हमदर्दी के मूल में वह पिता का स्‍मरण कर आंखों में आंसू भर लेती। कहती - वह इंसान से कहीं ज्‍यादा जानवर में प्रभु को पाते थे, यह राज उन्‍होंने मुझसे जब से शेयर किया था तब से कुत्‍ते ही मेरे सर्वस्‍व हैं।
इधर बीच महंगाई ने तोड़ सा दिया था शीरीन को। फंड वगैरह तो पहले ही कुत्‍तों पर कुर्बान हो चुका था। कभी चूल्‍हा जला तो ठीक वरना होटल से काम चल जाता। पहले कुत्‍ते बाद में खुद खाया,ऐसा था शीरीन का दस्‍तूर। होटलवाला भी कुछ रहम दिल था। शीरीन उसकी तारीफ के पुल बांधती रहतीं। कहतीं-बड़ा नेक इन्‍सान है। बहुत दुआएं देती उसको। कुत्‍ते भी शीरीन पर जान छिड़कते थे। शीरीन बीमार तो कुत्‍ते रोते, शीरीन खुश तो कुत्‍ते दहाड़ते। कुत्‍ते आपकी खुशी कैसे भांप लेते हैं, शीरीन बताने लगतीं- अजी इनको तो बस बढि़या खाना चाहिए। अच्‍छा खाना मिल गया तो सारे के सारे जनाब बहुत खुश हो जाते हैं। कुत्‍तों के नाम भी शीरीन ने अलबेले रख छोड़े थे। दड़बेनुमा घर में किसी का नाम तेन्‍दुलकर तो कोई वीरू। शाहरुख से लेकर आमिर तक। कुतियों के नाम भी ऐसे ही कुछ- जैसे रानी मुखर्जी, शिल्‍पा बगैरह। सब के सब शीरीन की एक पुकार पर भागे चले आते।

इस्‍लामिया की ओर से गुजरते वक्‍त शीरीन से यदाकदा मुलाकात हो जाती थी लेकिन फोन पर उनसे सम्‍पर्क बना रहता। एक रोज सूखी रोटी खाती शीरीन को देख दंग रह गया। शीरीन चीथड़ों में लिपटी थीं। उनकी यह हालत देखी न गई मुझसे। खख्‍खाशाह तो था नहीं लिहाजा बातो ही बातों में अपनी मित्र रोमा हेमवानी जी से इस प्रसंग की चर्चा कर बैठा। यह उनकी सदाशय वृत्ति ही थी कि बिना सवाल किये एक निश्चित राशि प्रतिमाह भिजवाना उन्‍होंने शुरू कर दिया। शीरीन ने फोन करके कुछ झेपते हुए बातचीत शुरू की- यह क्‍यों करवा दिया आपने, खैर गाड की ओर मैडम को थैंक्‍यू बोलियेगा। अबकी जाड़ा बहुत ही किटकिटाऊ पड़ा। शीरीन का फोन आया-क्‍या एक कम्‍बल दिलवा देंगे किसी से। 'नहीं, मैं खुद लेकर दे जाऊंगा'-मैंने कहा लेकिन यह बात महज बतफरोशी होकर रह जायेगी, यह अनुमान न था। कम्‍बल ले आया था लेकिन शीरीन का फोन आता रहा और मैं रोज वायदा करके भी काम में फंसता रहा। आज अल सुबह शीरीन की भांजी सुखबीर का फोन आया- आन्‍टी नहीं रहीं, ठंडक लग गई थी। फोन रखते ही मानो सन्निपात सा हो गया, काटो तो खून नहीं-बस एक सवाल-'अब वह कम्‍बल किसे दूंगा'।
निशातगंज कब्रिस्‍तान में 79 बरस की न जाने कितने कुत्‍तों की मां शीरीन दफना दी गई हैं। लखनऊ सूबे की राजधानी है। तमाम पुरस्‍कार, तमगे यहां घोषित होते और बंटते हैं लेकिन शीरीन सरीखे लोगों का नाम इन पुरस्‍कारों की सूची में नहीं होता। शीरीन के सारे बच्‍चे अनाथ हो गये हैं। खुद को भी अपने ही हांथों ठगा महसूस कर रहा हूं मैं। अब किसी रोज कब्रिस्‍तान में सो रही शीरीन को कम्‍बल ओढ़ाकर अपनी झेप मिटाने का प्रयास करूंगा लेकिन शीरीन के हांथ में कम्‍बल न दे पाने का मलाल ताजिन्‍दगी सालता रहेगा। परमात्‍मा शीरीन को अपने चरणों में जगह देगा। हो सके तो माफ करना आन्‍टी। -
लेखक दैनिक जागरण में मुख्य उप संपादक के पद पर कार्यरत हैं

Monday, June 14, 2010

किर्गिस्तान में फ़ंसे भारतीय छात्र


किर्गिस्तान के हिंसा प्रभावित ओश और जलालाबाद शहरों में फंसे करीब 100 भारतीयों छात्रों व अन्य भारतीयों ने दूतावास के अधिकारियों से उन्हें स्वदेश बुला लेने का
अनुरोध किया है। उनका कहना है कि वहां उनकी जिंदगी खतरे में है। जहीर खान नाम के एक भारतीय स्टूडेंट ने एक चैनल को फोन पर बताया, 'किसी भी छात्र की मौत किसी भी क्षण हो सकती है।' जहीर ने बताया कि हिंसा की वजह से भारतीय छात्र घरों तक ही सिमटे हुए हैं। अमृत दास नाम के एक अन्य छात्र ने बताया, 'मेरे घर के साथ वाली इमारत जल रही है। हम लोग अपने घर में फंसे हुए हैं।' सड़कों पर झड़पों की वजह से स्टूडेंट अपने घरों को लौटने के लिए हवाई अड्डे भी नहीं पहुंच सकते। जलालाबाद में पढ़ने वाली सुमिता ने बताया कि छात्रों के पास खर्च करने को पैसे भी नहीं बचे हैं। छात्रों ने शिकायत की है कि अधिकारियों ने उनसे अपने घरों को अंदर से बंद रखने को कहा है। कुछ छात्रों का कहना है कि बिजली, पानी और घरेलू गैस की आपूर्ति बंद कर दी गई है। किर्गिस्तान की आंतरिक सरकार ने शनिवार को एक आदेश पारित करते हुए पुलिस और सुरक्षाबलों को दंगों पर काबू पाने के लिए दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का हुक्म दे दिया।

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