
भुवनेश्वर : आख़िरकार, उडीसा सरकार को नक्सलियों की मांगों के सामने झुकना ही पडा। नक्सलियों ने अपनी सभी मांगें माने जाने के लिये हरी झंडी मिलने के बाद सात दिन पहले अगवा किए गए मलकानगिरि के कलेक्टर आर. विनीत कृष्णा और जूनियर इंजिनियर पवित्र मांझी को छोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक अगले 48 घंटों में दोनों को छोड़ दिया जाएगा। माओवादियों ने उड़ीसा सरकार के आगे 14 मांगें रखी थीं। इनमें से 8 सोमवार को मान ली गई थीं। बाकी 6 मांगें मंगलवार को मान ली गईं।
आधिकारिक सूत्रों ने दोनों की रिहाई किए जाने की तस्दीक की है। उन्होंने बताया की दोनों को अलग-अलग जगह से छोड़ा जा सकता है। कृष्णा और मांझी का माओवादियों ने मलकानगिरी के जनतपी गांव के पास से 16 फरवरी को अपहरण कर लिया था। उन्होंने दोनों की रिहाई के बदले उड़ीसा सरकार के सामने 14 मांगें रखी थीं।
नक्सलियों द्वारा चुने गए तीन में से एक वार्ताकार प्रफेसर जी. हरगोपाल ने राज्य सरकार के साथ तीन दिनों से चली आ रही बातचीत के खत्म होने पर कहा था कि मलकानगिरि के कलेक्टर और जूनियर इंजिनियर को 48 घंटों के भीतर रिहा कर दिया जाएगा।
राज्य के गृह सचिव यू. एन. बेहरा ने भी मंगलवार शाम को ही कलेक्टर की रिहाई के संकेत दे दिए थे। उन्होंने कहा था कि छह दिनों से चला आ रहा बंधक संकट हल कर लिया गया है। जल्दी ही कृष्णा नक्सलियों के चंगुल से रिहा हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार गंती प्रसादम और शीर्ष नक्सली नेता रामाकृष्णा की पत्नी पद्मा सहित पांच माओवादियों के खिलाफ मामले वापस लेने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन करने पर सहमत हो गई थी।
नक्सलियों ने उड़ीसा सरकार के सामने 14 मांगे रखी थीं। उनमें से प्रमुख थीं- आदिवासियों को जमीन का अधिकार देना, माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों का अभियान रोकना, जेल में बंद माओवादी नेताओं को छोड़ना, पुलिस कस्टडी में मारे गए माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले परिवारों को मुआवजा देना।
डीएम के अपहरण के बाद नक्सलियों की मांगे मान लिये जाने वाली इस घटना ने साबित कर दिया है कि हमारी सरकारें, हमारा प्रशासन, हमारी पुलिस इन नक्सलियों की समस्या से लडने में कितनी सक्षम हैं। इन नक्सली प्रभावित इलाक़ों में आए दिन ये नक्सली बेख़ौफ़ होकर लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं। पुलिस इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में नाकाम रहती है।
इन दिनों, हमारे देश में नक्सलवाद की समस्या आतंकवाद से ज़्यादा ख़तरनाक तरीक़ से उभरकर हमारे सामने आ रही है। आतंकवाद के ख़िलाफ़ जमकर आवाज़ उठाने वाले हमारे देश के नेता ना जाने क्यों नक्सलवाद के मुद्दे पर आवाज़ मुखर करने में हिचकिचाते हैं या घबराते हैं ?
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