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Thursday, March 10, 2011

धर्मगुरू दलाई लामा ने लिया राजनीति से संन्यास


धर्मशाला : तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है और कहा कि वक्त आ गया है जब उनकी जगह, तिब्बतियों को खुद लोकतांत्रिक तरीके से अपने नेता को चुनना चाहिए। दलाई लामा ने कहा है कि वे तिब्बतियों के राजनीतिक नेता की भूमिका त्याग रहे हैं।

तिब्बती गुरू ने कहा कि वह औपचारिक रूप से निर्वासित तिब्बती संसद का प्रस्ताव रखेंगे जो आवश्यक संशोधन कर सके। तिब्बती आंदोलन के निर्वासित प्रमुख 76 वर्षीय नेता ने कहा कि वह औपचारिक रूप से निर्वासित तिब्बती संसद का प्रस्ताव रखेंगे जो आवश्यक संशोधन कर सके। उन्होंने कहा, 1960 के दशक से मैं लगातार जोर दे रहा हूं कि तिब्बती लोगों को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो तिब्बती लोगों द्वारा स्वतंत्र रूप से निर्वाचित हो जिसे मैं अपनी शक्तियां दे सकूं। अब वह वक्त आ गया है जब इसे लागू किया जाए।

उन्होंने कहा, 'मैं लगातार जोर दे रहा हूं कि तिब्बती लोगों को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो तिब्बती लोगों द्वारा स्वतंत्र रूप से चुना गया हो जिसे मैं अपनी शक्तियां दे सकूं। अब वह वक्त आ गया है जब इसे लागू किया जाए।' दलाई लामा 1959 में चीनी शासन के खिलाफ तिब्बती विद्रोह की जयंती पर बोल रहे थे।

उन्होंने कहा, 'मार्च से शुरू होने वाले 14वें निर्वासित तिब्बती संसद के आगामी 11वें सत्र के दौरान मैं औपचारिक रूप से प्रस्ताव करूंगा कि निर्वासित तिब्बतियों के लिए चार्टर बनाने की खातिर आवश्यक संशोधन किया जाए। इसमें मेरी औपचारिक शक्तियों को निर्वाचित नेता को देने का फैसला दिखे।

चीनी शासन के खिलाफ असफल विद्रोह के बाद 1959 में भारत आए दलाई लामा ने कहा, 'मैं ऐसा जिम्मेदारी से बचने के लिए नहीं कर रहा हूं बल्कि यह तिब्बतियों के लिए लंबे समय में फायदे की बात है। ऐसा नहीं है कि मैं निराश होकर ऐसा कर रहा हूं। नोबेल पुरस्कार विजेता ने कहा कि वह सिर्फ तिब्बतियों के हित के लिए अपनी भूमिका निभाने को प्रतिबद्ध हैं।

उन्होंने उम्मीद जताई कि लोगों को धीरे-धीरे उनके इरादे समझ में आएंगे और उसी के मुताबिक उनका फैसला अमल में दिखने लगेगा। दलाई लामा ने इससे पहले तिब्बती आंदोलन के राजनीतिक प्रमुख पद से हटने का संकेत दिया था।

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