नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज माओवादियों की मदद का आरोप झेल रहे बिनायक सेन को जमानत दे दी। उनके शुक्रवार शाम तक रिहा होने की संभावना है। रायपुर की एक अदालत ने उन्हें माओवादियों की मदद का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बिनायक सेन की जमानत याचिका को नामंज़ूर कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने बिनायक सेन की जमानत की याचिका को मंजूर करते हुए कहा कि जमानत के बारे में बाकी शर्तें निचली अदालत तय करेगी।
जस्टिस एचएस बेदी ने याचिका पर अपने फैसले में कहा, वह नक्सलवादियों से सहानुभूति रखने वाले हो सकते हैं, लेकिन इस कारण वह राजद्रोह के दोषी नहीं हैं। बिनायक सेन के वकील एसके फरहान ने कहा, ऐसा कोई सबूत नहीं है कि वह किसी माओवादी संगठन के सदस्य हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेन के खिलाफ राजद्रोह का कोई केस नहीं बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले कई लोग हो सकते हैं और केवल इतने आरोप के लिए सेन को अपराधी नहीं माना जा सकता है।
पेशे से डॉक्टर और वेल्लोर के प्रतिष्ठित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से पढ़े हुए डॉ सेन ने जमानत की याचिका दर्ज करते हुए कहा था कि पुख्ता सबूत न होते हुए भी कोर्ट ने उन पर गलत आरोप लगाया है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा इस मामले में और समय मांगने के बाद 11 अप्रैल को जस्टिस एच एस बेदी और सी के प्रसाद की बेंच ने सुनवाई को स्थगित कर दिया था।

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