
नई दिल्ली : हमारा देश घोटालों और रिश्वतख़ोरी के मामले में ऊंची से ऊंची उपाधि हासिल कर रहा है। भ्रष्टाचार के नये से नये मामले सामने आते जा रहे हैं। मंत्रियों, नेताओं व अफ़्सरों से लेकर सभी सरकारी दफ़्तर इस भ्रष्टचार के दलदल में डूबे हुए हैं। अब तक इस देश की न्यायपालिका ही इस भ्रष्टाचार के दाग़ से पाक-साफ़ थी। लेकिन कांग्रेस के एक सांसद के आरोपों ने न्यायपालिका को भी दाग़दार बना दिया है।
कांग्रेस सांसद के. सुधाकरन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के एक जज पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। कन्नूर लोकसभा सीट से सांसद सुधाकरन ने एक सार्वजनिक सभा में आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने केरल के बार मालिकों को लाइसेंस जारी रखने के एवज में रिश्वत के तौर पर 36 लाख रुपये लिए थे। इन आरोपों के प्रकाश में आने के बाद माकपा ने इस पूरे मामले की गहन जांच की मांग की है।
सुधाकरन ने कोट्टारकारा में एक सभा में कहा था कि 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने केरल में 21 बार लाइसेंसों पर लगी हाईकोर्ट की पाबंदी हटाने के लिए यह रिश्वत ली थी। कांग्रेसी सांसद ने यह भी दावा किया कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित केरला हाउस में हुई इस घटना को वह चुपचाप देखते रहे। हालांकि उन्होंने यह कहा कि इन आरोपों को साबित करने के लिए उनके पास कोई सबूत नहीं हैं लेकिन यदि उनसे पूछा गया तो वह अदालत में इस जज का नाम और अन्य ब्यौरा कबूल करने को तैयार हैं।
कांग्रेसी सांसद के इस आरोप के बाद केरल में सत्तारुढ माकपा ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले का खुद संज्ञान लेते हुए मुकदमा दर्ज करते हुए जांच करानी चाहिए। पार्टी ने जारी बयान में कहा, ‘कांग्रेस नेता ने गंभीर आरोप लगाए हैं जिससे न्यायपालिका संदेह के दायरे में है। रिश्वत देने वाले लोगों और इसे कबूल करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज का नाम का खुलासा करना सुधाकरन की नैतिक जिम्मेदारी है।’
हमारा देश भ्रष्टाचार के समुन्द्र में डूबता जा रहा है। अब शायद न्यायपालिका से भी लोगों का विश्वास उठने लगेगा। अब तक इस आरोप से अछूती रहने वाली न्यायपालिका को भी इस पैसे की हवस ने कटघरे में खड़ा कर दिया है।

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